
मिलना होता है कुछ लोगों को ज़िन्दगी में, तो बस वो किसी ना किसी बहाने मिल ही जाते हैं.
तुम भी तो बस यूँ ही मिले थे, अजनबी की तरह….
उस दिन ये सोचकर मैं फ्लाइट में बैठी थी कि जाते ही सो जाऊँगी. नींद आ भी गई थी कि अचानक अटेंडेंट के आने की वजह से मेरी नींद खुल गई. मैंने देखा कि तुमने खाना लेने से मन कर दिया था. 5 घंटे की फ्लाइट थी. तुम खा क्यों नहीं रहे, इस बात पर हमारी बात शुरू हुई. खाने में पनीर देखते ही मैंने तुम्हें कहा कि मुझे पनीर पसंद नहीं, तुम खाओगे? तुमने चुपचाप मुझे देखा और मेरे साथ डिनर करने लगे. धीरे धीरे खाने पर बातें हुईं, फिर अपने अपने देश की और फिर सारी देश दुनिया की बातें हमारे पास आ चुकी थीं.
तुम चुप रहने वाले लोगों में से थे और मैं बोलने वालों में से…बोलना शुरू करती तो फिर रुकने का नाम नहीं लेती…किस्से कहानियाँ ही इतनी होती थीं मेरे पास. एक बात ख़त्म होती नहीं कि दूसरा किस्सा तैयार रहता था. फ़िल्म्स, किताबें, सफ़र, नौकरी…हमारी बातों में लगभग सारे ही विषय शामिल ही चुके थे. तुम बस मुस्कुरा कर मुझे सुनते जा रहे थे, जैसे मुझे सुनना, तुम्हारी ज़िन्दगी के पसंदीदा कामों में से एक बन चुका था.
तुमने बातों ही बातों में मुझसे मेरी ईमेल आईडी माँगी. देने पर तुम्हारे मन में कुछ आया और तुमने मुझसे पूछा- “इसको यूज़ तो करती हो ना?” मैं मुस्कुराई और हाँ में सर हिलाया.
बताने की ज़रूरत भी नहीं कि वो 5 घंटे कैसे बीत गए. हम दोनों को ही पता था कि शरीर से अलग होने का वक़्त आ चुका है. शरीर इसलिए कह रही हूँ क्यूंकि इतना तो महसूस हो चुका था कि कुछ दिन के लिए ही सही, दोनों के मन में, दोनों रहने वाले हैं. हम सामान लेकर एयरपोर्ट से बाहर निकले. तुम ओला बुक कर रहे थे और मैं ऊबर. मुझे कैब नहीं मिल रही थी और तुमने कहा कि आधा रास्ता हमारा कॉमन है, तो साथ ही चलो, उसके बाद उसी कैब से चली जाना. रात हो चुकी थी तो मुझे भी लगा कि यही सही रहेगा. मैं एक अजनबी के साथ बैठ गई. हम 1-2 लाइन कुछ बोलते और फिर चुप हो जाते, जैसे हम अभी अभी मिले हैं…जैसे हम अजनबी हैं….
तुम्हारा होटल आ चुका था. तुमने उतरते हुए कहा कि आराम से जाना. मैं तुम्हें मेल करूँगा. मैंने भी हाँ में सर हिलाया और एक मुस्कराहट लिए मैंने बाय बोला.
मेरी कार जैसे ही मुड़कर थोड़ी देर आगे बढ़ी कि फ़ोन पर एक मेल आया. देखा तो वो तुम्हारा था. “बेस्ट ट्रैवलर पार्टनर”, तुमने मेल को ये टैग लाइन दिया था. मेरे चेहरे पर एक बड़ी सी स्माइल आई और उसके बाद हम मेल पर ऐसे बातें कर रहे थे, जैसे व्हाट्स ऐप पर चैट कर रहे हों.
कुछ दिनों बाद तुमने कहा कि मैं कल शाम वापिस जा रहा हूँ, अगर फ्री हो तो मिलते हैं. मैंने भी अपनी तरफ से इंटरेस्ट दिखाया और पहुँच गई मिलने. खूबसूरत सर्दी की शाम थी. हमने साथ डिनर किया और फिर टहलने लगे. तुम्हें ठण्ड लग रही थी तो हमने कुल्हड़ वाली चाय भी पी. हम फिर से टहलने लगे. हम हाथों में हाथ लेकर नहीं टहल रहे थे, शायद एक दूसरे का मन लेकर ज़रूर टहल रहे थे. मैंने याद दिलाया- “अब चलना चाहिए, कल ऑफिस है मेरा. तुम भी थोड़ा संकुचाएं. कहा- “ओके! मैं तो कल शाम तक फ्री हूँ पर हाँ, तुम्हें लेट हो जाएगा.” मैं जानती थी, तुम ठहरना चाहते थे. यह भी जानती थी कि ना तुम इस बात को कभी कह पाओगे, ना ही कभी मान पाओगे. हमने थोड़ी देर और टहलते हुए बातें की. तुमने कैब बुक की. जब कैब आ गई तो पता चला कि वो अपने आप कैंसिल भी हो गई. अरे हाँ बाबा, मैंने कब कहा भला कि तुम्हारा और रुकने का मन था. तुमने दूसरी कैब बुक की और फिर मिलेंगे, कह कर चले गए. मैं थोड़ी देर वही रुकी रही, जैसे मेरे रुकने से वो वक़्त रुक जाता…
मेल का सिलसिला चलता रहा. मेल पर इतने पास थे तुम कि कभी कोई दूरी महसूस नहीं हुई. कई बार सोचा, रुक जाना चाहिए. तुमसे पूछा भी मैंने कि थोड़ा रुकें? तुमने जवाब नहीं दिया मैंने ‘ख़ामोशी का मतलब हाँ में ही निकाला’.
मज़ेदार थी यह बात कि हमने इतनी बातें कर ली थी कि मेल सेंचुरी मार चुका था. हमने एक दूसरे को नंबर नहीं दिया था, पर बातों में कोई कमी नहीं थी. समय बीतता चला गया. बातें होती चली गईं…
ऑफिस के काम से मुझे फिर से उड़ना था और आना था तुम्हारे देश. मैंने आने से पहले तुम्हें बताया कि मैं आ रही हूँ. “आ जाओ’ कहा था तुमने. तुम्हारी आवाज़ में मैंने एक लम्बे इंतज़ार और सुकून, दोनों को महसूस किया. मैं काम में लगी रही. शनिवार का दिन मिलने के लिए तय हुआ. लगा कि कह दूं, “रविवार मिल सकते हैं क्या? ज़्यादा समय मिलेगा.” पर मैंने चुप्पी साध ली…
तुमने एक जगह बताई. मैं टैक्सी से वहाँ पहुँच गई और तुम्हें ढूंढने लगी. हम दोनों एक दूसरे को ढूँढ रहे थे. बीच में बस एक दीवार थी. मैं दीवार के बाहर थी और तुम अंदर….मुझे थोड़ी घबराहट हुई और लगा कि ये दीवार शायद हमेशा ही रहने वाली है. लगभग 6-7 मिनट बाद तुम सामने से आते दिखे. तुम्हें देखना, अटकी हुई साँस वापिस आने जैसा था. तुमने बाहें खोली और मैं झिझकते हुए साइड से मिली…हम गले लग सकते थे…पर ये क्या हुआ था अचानक मुझे…
तुम मुझे एक कैफ़े में लेकर गए, जहाँ फिर से हम फ्लाइट वाले यात्री बन चुके थे और हमारी बातें चालू थीं. इस बार हम एक दूसरे को पहले से थोड़ा ज़्यादा जान रहे थे. एक दूसरे की पसंद, रूटीन, घर…हम सब समझ रहे थे बेवजह…
खाकर जब हम बाहर निकले तो मैं अपने होटल के लिए टैक्सी बुक करने लगी. तुमने कहा तुम मुझे छोड़ोगे. उम्मीद नहीं थी कि तुम ये कोशिश करोगे, पर अच्छा लगा. शायद हम दोनों ही ज़रा और देर रुकना चाहते थे. गुस्सा भी आया कि इसके देश में हूँ और यह रविवार को अपना रूटीन बदलने के लिए तैयार नहीं…पर मैं शांत रही. छोड़ते हुए तुमने कहा कि कुछ छूट तो नहीं गया? मैंने ना में सर हिलाया. उसने फिर से मेरी टांग खींची, दिल तो नहीं रह गया मेरे पास? उफ्फ्फ़ ये इतना कैसे खुल गया मेरे साथ, सोचकर मैंने साँसे संभाली और हँसकर कहा, “इतने बुरे दिन भी नहीं आये मेरे”. मैं फिर से तुम्हारे सीने के पास गई, साइड से गले मिली और फिर एक लम्बे वक़्त के लिए अलग हो गई.
मैं वापिस अपने रूम में आ चुकी थी. दिल तो नहीं, पर हाँ, मन तुम्हारे पास रह गया था शायद. मैं सोचती रही अपनी पहली मुलाक़ात से लेकर अब तक का सफ़र…मुझे सब कुछ याद था…सब कुछ….तुमने वही फुटवियर पहना था, जो तुमने ट्रेन में पहना था. ब्लैक टी-शर्ट में सही से लगे तुम. बातें भी सही थी. इस बार तुम पहली बार से ज़्यादा बोल रहे थे और मुझे किसी को सुनना अच्छा लग रहा था…
मैं वापिस अपने देश आ चुकी हूँ. हम अभी भी बहुत बातें करते हैं, जो कि मुझे लगा था कि शायद कम हो जाएँगी.
हम दोनों के बीच फ़ासला बहुत है….उम्र का…जगह का…कल्चर का…तुम हिंदी खाते नहीं, मैं इंग्लिश छूती नहीं…मज़ेदार हैं हम दोनों…
तुमने कहा है कि तुम कभी नहीं जाओगे, पर हमारा पास आना भी मुमकिन नहीं…सुनो, मैंने सुना है कि पास आने पर लोग दूर हो जाते हैं तो तुम दूर ही रहना. मुझे हमेशा अजनबी की तरह ही मिलना…बार बार…हर बार…