मोम सी मैं…


जाने कितने ही मौसम बीत गए, पर तेरी यादों का मौसम भला क्यों नहीं गुज़रता। तुम्हारी बहुत याद आती है। याद आती हैं वो कोशिशें, जो मैंने की थी तुम्हें सहेजने और संवारने के लिए। रिश्ता बनाना मुश्किल होता है पर उस रिश्ते में बने रहना उससे भी ज़्यादा कठिन। मैंने ये काम आसां सा कर दिया था तुम्हारे लिए।

बस स्टॉप पर चलती तेज़ हवा से बचाने के लिए जिस जैकेट में तुम मुझे समेट लिया करते थे, उसकी गर्माहट आज भी बनी हुई है। मेरे गुस्से में कुछ भी बोलने पर तुम्हारा बस मुस्कुरा कर देखना, तुम्हारी वो नज़रों की तपिश, मेरे केशों में उलझी तुम्हारी वो उंगलियां…सब याद आता है।

यादें इस कदर याद हैं मुझे कि मैं हर पल का हिसाब दे सकती हूं। किस दिन तुमने किस रंग की शर्ट पहनी, किस दिन दाढ़ी बढ़ी हुई थी, किस दिन हमने क्या खाया, किस दिन हम कहां गए, किस दिन बारिश में भीगे, किस दिन रजाई में दुबके…किस दिन धूप सेंकी और किस दिन बस फ़िल्में देखीं…हां, हर दिन की यादें हैं मेरे पास। सब कुछ याद है मुझे…सब कुछ। मुझे तुम्हारी हंसी भी याद है और तुम्हारे आंसू भी। मेरे दुख में तुम्हारा सहलाना भी याद है और गुस्से में तुम्हारा ठुकराना भी। याद है मुझे वो शाम जब एक दूसरे का हाथ थामे रात हो जाती थी। याद तो वो पल भी हैं, जब बिना कुछ बोले हम बस एक दूसरे को देखा करते थे। तुम कार चलाते थे और मैं तुम्हें छेड़ा करती थी। मेरे पांव के अंगूठे से तुम्हारे गालों को सहलाना भी नहीं भूलता मुझे। तुम्हारे उस ‘आफ्टर शेव’ की खूशबू मेरी सांसों में आज भी रची बसी है।

तुम्हें तुम्हारी जीत चाहिए थी। वो जीत, जो शायद तुम्हें एक मर्द होने का एहसास दे। दिल जलाने में तुमने कब महारत हासिल कर ली, ये पता भी नहीं चला मुझे। तुम्हें जीत दिलाने के लिए हारी मैं…हां, मैं अपराजिता हो गई पराजित।

जो पल तुम्हारे लिए सहज ही बीत गए, मैं उन पलों में ही अटक गई। जब अंतिम गले मिली थी मैं तुमसे, उसमें मैं मोम सी जम गई। अब कोई तपिश महसूस नहीं होती। लगता नहीं कि अब कभी पिघलूंगी मैं…

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